Sunday, February 9, 2014

अब जो फिर कोई 'दामिनी' बनी


॥राजस्थान मेँ पल-पल मौत जूझती गैंगरेप की शिकार मिथिला की एक बेटी॥

बाबूजी आज तू नहीं

 

तो तेरी बेटी अकेली है

 

मेरी आवाज़ गलियों तक भी न पहुँचती,

 

आँगन में ही सिमट जाती है।


 

मैंने क्या बिगारा था ?

 

मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया ?

 

लोग कहते हैं मेरा बलात्कार हुआ

 

अब तुम्हारी मैना नहीं चहचहाती है।



 

याद है मुझे तुम्हारे काँधे पर मेले में घूमना

 

मिटटी के खिलौने या चीनी का मुरब्बा माँगना,

 

इससे जादा क्या माँगा था जो रूठ गए ...

 

अब तुम्हारी बेटी बहादुर है, उसे कुत्ते के भौंकने से डर नहीं लगता

 

पर इंसानी चेहरे डराती है।

 

---------------

अब न पड़ने दो किचड़ मानवता के शाख पर

क्यूंकि अब जो फिर कोई 'दामिनी' बनी

संविधान होगा ताक पर ...

आसान नहीं राधा सा प्रेम करना

क्या रिश्ता है तेरा मुझसे ??? …………

 

दबे पाँव कमरे में आती हो और मुझे चैन से सोया देख फिर कहीं … गुम हो जाती हो !

 

 .... तुम क्यूँ याद आती हो। … तुम क्यूँ याद आती हो।

 

-------------------- 

 

रुक्मिणी बन आसान है प्रेम करना … आसान नहीं राधा सा प्रेम करना।

  

तुमने अपनी एक गलती दबाने को वो सब पन्ने पलट डाले जिनमे मेरा दर्द उकेरा था


--------------------------------------------

चल भगवा लहरा ले

चल भगवा लहरा ले

खो चुके जो मान धरा पर

फिर से उसको पा लें

चल बढ़ा कदम ओ साथी

मिलकर भारत बचा लें !

______________________________ 

 


लघु पंक्तियाँ


लेकर कीमत साँसों कि

फूलों का तौफा देते हैं


कैसे गैरों से मोहब्बत होती है

यहाँ तो अपने धोखा देते हैं !

                                             -------------------------------------------------- 

माना जो गुज़र गया सो गुज़र गया
 

पर ज़ख्म वो इतना गहरा छोड़ गया
 

की जब भी उसे भुलाने की सोची
 

कमबख्त ये भरने से मुकर गया

                                ------------------------------- 


सोचती होगी छोड़ उसे चैन से सो रहा होऊंगा

 


और ये भी जानती है की उसके बिना जी नहीं सकता

 

बैठ कोने में कहीं रात भर रो रहा होऊंगा ...

---------------------------------------- 

बहुत रात हो गयी है

अब तुम भी सो जाओ


क्यों जगाते हो और ...


जागते हो मेरे ख्यालों में



------------------------------------ 

 

कब से इस उलझन में हूँ 

 

गोरी गेंदा गमके या तू 

 

 -----------------------------------

 

अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें

कीमती है ठहराव।

______________________

निशां छोड़ दे तू इस कदर यादों के फलक पे

 

के जब भी तेरा जिक्र आये

 

होंठ मुस्कुराये और अश्रु बाँधे न बंधे पलक पे

___________________________


 

महज

 

साँसों का उतार-चढ़ाव

 

नहीं है जिंदगी

 

वक़्त ढलान है

 

जीवन यात्रा

 

प्रेम पड़ाव।

 

इस आपाधापी में

 

कुछ

 

कीमती है

 

तो है

 

ठहराव। 

____________

 

भावनाएँ प्रबल है

 

हम साथ सबल

 

समय निष्ठुर

____________


जानता हूँ

 

तुमने अंतरमन में

 

अथाह प्रेम सिमेट रक्खा है

 

पर ...

 

इस प्यार को पाने में

 

उसी तरह घायल हो जाता हूँ

 

जैसे नारियल फोड़ के खाने में !

 

तुम …

 

आम सा क्यूँ नहीं होती …

 

जरा सी छुअन से मधुर रसधार से भीगा देती !


 अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें 

शत्रु पराये हैं नहीं, आसतीन में छुपे साँप है

कॉंग्रेस के हाथ में जिसका भी हाथ है 

 

देश के दुर्भाग्य में उस का भी साथ है 

 

 

लानत उसपर जो हिंदुओं के खिलाफ है
 

गुनहगार सब यहाँ चाहे हम हैं या आप हैं 



जम रहा लहू यहाँ बस्ती में क्यूँ आग है
 

आसाम में चुप, तो गोधरा पर क्यूँ अलाप है



किसकी है ये जमीं किसकी ये जागीर है


क्यूँ तलवे तले रौंद रहा क्यूँ हो रहा प्रलाप है


 

अडिग था जोकभी, सत्य वो रहा क्यूँ काँप है
 

शत्रु पराये हैं नहीं, आसतीन में छुपे साँप है


 

क्या हार कि है ये धुन या प्रलय कि कोई थाप है
 

रक्तधार सा होरहा प्रवाह रहा गंगा कि ये विलाप है

 

क्यों कौटिल्य सो रहा किसका ये शाप है 
 

मनु नहीं मिल रही गुम कहाँ प्रताप है !


अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें

उस दो आने कि इमरती पर ..

उस दो आने कि

इमरती पर मेरा जी अटका रहा

किस्मत और हैशियत ने

मुझे चॉकलेट वाले केक पड़ोस दिए

मदमाती माधुर्य मथित मधुसरिस

उस चाशनी में

मेरा जी अटका रहा


कीमत तो थी दो आना ही

पर रस का मोल लगाना नामुमकिन


कोई नयन से तार रहा

कागा ले उड़ने को ताक रहा

घात लगाये श्रृगाल खड़े

बस तब तक

जब तक

जड़ जड़ रक्षक जाग रहा !

मेरा जी अटका रहा


किसी कुसुम कि पंखुड़ियों से

थे कोमल उसके अंग बड़े

स्पर्श अलौकिक, मौन रहा

पलक पाँवड़े पंकज में ही

मैंने कितने अंक भरे


सीढ़ी चढ़ता देवालय का

पर मंद मंद मुस्काती मेवा

मेरा मन भटका रहा

उस दो आने कि

इमरती पर मेरा जी अटका रहा

मेरा जी अटका रहा 

 

 

अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें