उस
दो आने कि
इमरती
पर मेरा जी अटका रहा
किस्मत
और हैशियत ने
मुझे
चॉकलेट वाले केक पड़ोस दिए
मदमाती
माधुर्य मथित मधुसरिस
उस
चाशनी में
मेरा
जी अटका रहा
कीमत
तो थी दो आना ही
पर
रस का मोल लगाना नामुमकिन
कोई
नयन से तार रहा
कागा
ले उड़ने को ताक रहा
घात
लगाये श्रृगाल खड़े
बस
तब तक
जब
तक
जड़
जड़ रक्षक जाग रहा !
मेरा
जी अटका रहा
किसी
कुसुम कि पंखुड़ियों से
थे
कोमल उसके अंग बड़े
स्पर्श
अलौकिक, मौन
रहा
पलक
पाँवड़े पंकज में ही
मैंने
कितने अंक भरे
सीढ़ी
चढ़ता देवालय का
पर
मंद मंद मुस्काती मेवा
मेरा
मन भटका रहा
उस
दो आने कि
इमरती
पर मेरा जी अटका रहा
मेरा
जी अटका रहा
अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें
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