माँ
सर्दी का वह मौसम
और सुबह कि पहली धूप
पीले आँचल में लिपटा
माँ का वो दूधिया रूप।
लेकर पूजा कि थाली
तुलसी चौड़े तक जाना
मुँडेर पर कौए का इतराना
टन टन .. टन टन ...
आठ आने का खोमचा
मेरे जिद के आगे
हर बार विफल होती थी
आँचल के
खूंट में बंधा दो रूपया
माँ मुझको दे देती थी ..
क्रमश ...
अच्छी या बुरी जैसी भी ,अपना विचार अवश्य दें
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