Sunday, February 9, 2014

उस दो आने कि इमरती पर मेरा जी अटका रहा

उस दो आने कि

इमरती पर मेरा जी अटका रहा

किस्मत और हैशियत ने

मुझे चॉकलेट वाले केक पड़ोस दिए

मदमाती माधुर्य मथित मधुसरिस

उस चाशनी में

मेरा जी अटका रहा


कीमत तो थी दो आना ही

पर रस का मोल लगाना नामुमकिन


कोई नयन से तार रहा

कागा ले उड़ने को ताक रहा

घात लगाये श्रृगाल खड़े

बस तब तक

जब तक

जड़ जड़ रक्षक जाग रहा !

मेरा जी अटका रहा


किसी कुसुम कि पंखुड़ियों से

थे कोमल उसके अंग बड़े

स्पर्श अलौकिक, मौन रहा

पलक पाँवड़े पंकज में ही

मैंने कितने अंक भरे


सीढ़ी चढ़ता देवालय का

पर मंद मंद मुस्काती मेवा

मेरा मन भटका रहा

उस दो आने कि

इमरती पर मेरा जी अटका रहा

मेरा जी अटका रहा

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