Sunday, February 9, 2014

शत्रु पराये हैं नहीं, आसतीन में छुपे साँप है

कॉंग्रेस के हाथ में जिसका भी हाथ है 

 

देश के दुर्भाग्य में उस का भी साथ है 

 

 

लानत उसपर जो हिंदुओं के खिलाफ है
 

गुनहगार सब यहाँ चाहे हम हैं या आप हैं 



जम रहा लहू यहाँ बस्ती में क्यूँ आग है
 

आसाम में चुप, तो गोधरा पर क्यूँ अलाप है



किसकी है ये जमीं किसकी ये जागीर है


क्यूँ तलवे तले रौंद रहा क्यूँ हो रहा प्रलाप है


 

अडिग था जोकभी, सत्य वो रहा क्यूँ काँप है
 

शत्रु पराये हैं नहीं, आसतीन में छुपे साँप है


 

क्या हार कि है ये धुन या प्रलय कि कोई थाप है
 

रक्तधार सा होरहा प्रवाह रहा गंगा कि ये विलाप है

 

क्यों कौटिल्य सो रहा किसका ये शाप है 
 

मनु नहीं मिल रही गुम कहाँ प्रताप है !


अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें

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