Sunday, February 9, 2014

अब जो फिर कोई 'दामिनी' बनी


॥राजस्थान मेँ पल-पल मौत जूझती गैंगरेप की शिकार मिथिला की एक बेटी॥

बाबूजी आज तू नहीं

 

तो तेरी बेटी अकेली है

 

मेरी आवाज़ गलियों तक भी न पहुँचती,

 

आँगन में ही सिमट जाती है।


 

मैंने क्या बिगारा था ?

 

मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया ?

 

लोग कहते हैं मेरा बलात्कार हुआ

 

अब तुम्हारी मैना नहीं चहचहाती है।



 

याद है मुझे तुम्हारे काँधे पर मेले में घूमना

 

मिटटी के खिलौने या चीनी का मुरब्बा माँगना,

 

इससे जादा क्या माँगा था जो रूठ गए ...

 

अब तुम्हारी बेटी बहादुर है, उसे कुत्ते के भौंकने से डर नहीं लगता

 

पर इंसानी चेहरे डराती है।

 

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अब न पड़ने दो किचड़ मानवता के शाख पर

क्यूंकि अब जो फिर कोई 'दामिनी' बनी

संविधान होगा ताक पर ...

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