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Sunday, February 9, 2014

कहमुकरी : प्रेम

कहमुकरी : प्रेम 

न कछु रासै न केहु भावै 

 

 कर्ण बजै मधुर संगीत

 

के सखी उलझन , न सखी प्रीत


रूठता तो माँ से था




मैं कभी नहीं रूठूँगा  …
कभी नहीं
कभी नहीं रूठूँगा !
कभी नहीं रूठूँगा तुमसे !!
क्यूँकि रूठता तो माँ से था  …
वो मनाये बिना न सोती थी।


तुम्हे जीत तो मैं लूँगा ही  … अफसोस प्रेम भी जीता जा सकता !

 

अच्छा या बुरा जैसाभी, अपना विचार अवश्य दें

अब जो फिर कोई 'दामिनी' बनी


॥राजस्थान मेँ पल-पल मौत जूझती गैंगरेप की शिकार मिथिला की एक बेटी॥

बाबूजी आज तू नहीं

 

तो तेरी बेटी अकेली है

 

मेरी आवाज़ गलियों तक भी न पहुँचती,

 

आँगन में ही सिमट जाती है।


 

मैंने क्या बिगारा था ?

 

मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया ?

 

लोग कहते हैं मेरा बलात्कार हुआ

 

अब तुम्हारी मैना नहीं चहचहाती है।



 

याद है मुझे तुम्हारे काँधे पर मेले में घूमना

 

मिटटी के खिलौने या चीनी का मुरब्बा माँगना,

 

इससे जादा क्या माँगा था जो रूठ गए ...

 

अब तुम्हारी बेटी बहादुर है, उसे कुत्ते के भौंकने से डर नहीं लगता

 

पर इंसानी चेहरे डराती है।

 

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अब न पड़ने दो किचड़ मानवता के शाख पर

क्यूंकि अब जो फिर कोई 'दामिनी' बनी

संविधान होगा ताक पर ...

आसान नहीं राधा सा प्रेम करना

क्या रिश्ता है तेरा मुझसे ??? …………

 

दबे पाँव कमरे में आती हो और मुझे चैन से सोया देख फिर कहीं … गुम हो जाती हो !

 

 .... तुम क्यूँ याद आती हो। … तुम क्यूँ याद आती हो।

 

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रुक्मिणी बन आसान है प्रेम करना … आसान नहीं राधा सा प्रेम करना।

  

तुमने अपनी एक गलती दबाने को वो सब पन्ने पलट डाले जिनमे मेरा दर्द उकेरा था


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चल भगवा लहरा ले

चल भगवा लहरा ले

खो चुके जो मान धरा पर

फिर से उसको पा लें

चल बढ़ा कदम ओ साथी

मिलकर भारत बचा लें !

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लघु पंक्तियाँ


लेकर कीमत साँसों कि

फूलों का तौफा देते हैं


कैसे गैरों से मोहब्बत होती है

यहाँ तो अपने धोखा देते हैं !

                                             -------------------------------------------------- 

माना जो गुज़र गया सो गुज़र गया
 

पर ज़ख्म वो इतना गहरा छोड़ गया
 

की जब भी उसे भुलाने की सोची
 

कमबख्त ये भरने से मुकर गया

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सोचती होगी छोड़ उसे चैन से सो रहा होऊंगा

 


और ये भी जानती है की उसके बिना जी नहीं सकता

 

बैठ कोने में कहीं रात भर रो रहा होऊंगा ...

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बहुत रात हो गयी है

अब तुम भी सो जाओ


क्यों जगाते हो और ...


जागते हो मेरे ख्यालों में



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कब से इस उलझन में हूँ 

 

गोरी गेंदा गमके या तू 

 

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अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें

कीमती है ठहराव।

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निशां छोड़ दे तू इस कदर यादों के फलक पे

 

के जब भी तेरा जिक्र आये

 

होंठ मुस्कुराये और अश्रु बाँधे न बंधे पलक पे

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महज

 

साँसों का उतार-चढ़ाव

 

नहीं है जिंदगी

 

वक़्त ढलान है

 

जीवन यात्रा

 

प्रेम पड़ाव।

 

इस आपाधापी में

 

कुछ

 

कीमती है

 

तो है

 

ठहराव। 

____________

 

भावनाएँ प्रबल है

 

हम साथ सबल

 

समय निष्ठुर

____________


जानता हूँ

 

तुमने अंतरमन में

 

अथाह प्रेम सिमेट रक्खा है

 

पर ...

 

इस प्यार को पाने में

 

उसी तरह घायल हो जाता हूँ

 

जैसे नारियल फोड़ के खाने में !

 

तुम …

 

आम सा क्यूँ नहीं होती …

 

जरा सी छुअन से मधुर रसधार से भीगा देती !


 अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें 

शत्रु पराये हैं नहीं, आसतीन में छुपे साँप है

कॉंग्रेस के हाथ में जिसका भी हाथ है 

 

देश के दुर्भाग्य में उस का भी साथ है 

 

 

लानत उसपर जो हिंदुओं के खिलाफ है
 

गुनहगार सब यहाँ चाहे हम हैं या आप हैं 



जम रहा लहू यहाँ बस्ती में क्यूँ आग है
 

आसाम में चुप, तो गोधरा पर क्यूँ अलाप है



किसकी है ये जमीं किसकी ये जागीर है


क्यूँ तलवे तले रौंद रहा क्यूँ हो रहा प्रलाप है


 

अडिग था जोकभी, सत्य वो रहा क्यूँ काँप है
 

शत्रु पराये हैं नहीं, आसतीन में छुपे साँप है


 

क्या हार कि है ये धुन या प्रलय कि कोई थाप है
 

रक्तधार सा होरहा प्रवाह रहा गंगा कि ये विलाप है

 

क्यों कौटिल्य सो रहा किसका ये शाप है 
 

मनु नहीं मिल रही गुम कहाँ प्रताप है !


अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें

उस दो आने कि इमरती पर ..

उस दो आने कि

इमरती पर मेरा जी अटका रहा

किस्मत और हैशियत ने

मुझे चॉकलेट वाले केक पड़ोस दिए

मदमाती माधुर्य मथित मधुसरिस

उस चाशनी में

मेरा जी अटका रहा


कीमत तो थी दो आना ही

पर रस का मोल लगाना नामुमकिन


कोई नयन से तार रहा

कागा ले उड़ने को ताक रहा

घात लगाये श्रृगाल खड़े

बस तब तक

जब तक

जड़ जड़ रक्षक जाग रहा !

मेरा जी अटका रहा


किसी कुसुम कि पंखुड़ियों से

थे कोमल उसके अंग बड़े

स्पर्श अलौकिक, मौन रहा

पलक पाँवड़े पंकज में ही

मैंने कितने अंक भरे


सीढ़ी चढ़ता देवालय का

पर मंद मंद मुस्काती मेवा

मेरा मन भटका रहा

उस दो आने कि

इमरती पर मेरा जी अटका रहा

मेरा जी अटका रहा 

 

 

अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें  

लौटकर आऊँगा

तुम्हे छोड़

 

बहुत दूर चला जाऊँगा।

 

वर्षों बाद फिर

 

लौटकर आऊँगा।

 

यदि राह तके तुम मेरे

 

तो जन्मों का फिर बंधन।

 

वर्ना

 

मैं तो जोगी था ही

 

फिर से जोगी बन जाऊँगा।

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 तेरा मुझसे प्रेम करना … एहसान है मुझपर

भला भस्म रमाता जोगी से भी क्या कोई मोहब्बत करता है।



अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें

क्यों पूछते हो कि प्रेम क्या है

क्यों पूछते हो कि प्रेम क्या है


क्यों पूछते हो कि प्रेम क्या है

 

उतर के देखो आंधियाँ है

 

जर्रे में शंभु लीन बैठे

 

महमहे में है तल्ख कितनी

 

क्या तखलीक कि कोई खामियाँ है


महमहे -- सुगंध
तल्ख -- तीक्ष्ण
तखलीक --रचना creation

अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें



शुभ प्रभात का शुभ वंदन

शुभ प्रभात का शुभ वंदन  

चल उठ कर शुभ वंदन
ये जीवन-मरण का व्यर्थ क्रंदन
तज परमारथ को स्वार्थ सकल
तू बह कल कल
मातृभूमि को आह्लादित करने वाली
गंगा निर्मल

उ रह जे हिंदी छांटी रहल रह

करेजा फैट गेल...


हम हुनका सs मैथिलि बsजलौं


उ रहs जे हिंदी छांटी रहल रहs

 घंटा भरक बात मs कान तरैस गेल 


मुदा एक शबद नै मैथिलि बाजलक


पुछ्लौं झाजी घर कतs भेल?


कहलक दरभंगा "I m outside from a long " 


आखिर हमर मsन हरखित भेल


जब सुनलौं मैथिलि हुनकर मुख स


पुछला पर की अप्पन भाषा किया नs बजै छि


बच्चा सsब कs किया नs गाम भेजै छि 


कहलक --यौ की कही लाज लगे य


फाटs धरती जे हम समाबौं, हमर मू मs धान दियौ तs लावा 


कहलों हुनका जे यौ अहाँ कोन नौकरी करै छि 


जे अप्पन भाषा कs एना तजै छि 


"
मैथिलि" s सम्मान भेटल य


ओही सs पहचान भेटल य 


क्रमश: ...

 

नीक या बेजाय जेहेन लागल  … जरुर कहब !

अहाँ की देखलौं !!

अहाँ की देखलौं !!

 

चैर चक्का के गाड़ी
तैपर बैसल किछु मैथिल सवारी ?
अहाँ की देखलौं !!
यौ हम देखै छि ----रथ
सारथी जेकर कृष्ण छला
नव विकास के सृजन करैत
उ सब बाधा क तोइर बढैत गेला ..
अहाँ की देखलौं !!
यौ हम देखै छि ---भानु
मध्य रैत म उदित भेला
जे अन्हार-पीड़ा सब हरैत गेला
निरास युवा म नवस्फूर्ति भरैत गेला ..
अहाँ की देखलौं !!
कैक बरख स विस्म्रित भेल जे
अपने घर म आन बनल
आय ओहि सुतल उर
म स्वाभिमान जगल
गौरवशाली मिथिला निर्माण
आब सम्मान बनल
अनकड़ नै बात पुछू
अपने कतेक विरुद्ध भेला
धक्का देनिहार दुई, सौ लय मिलबैत गेला ..
संघर्ष हिमालय के उ चढ़ैत गेला उ चढ़ैत गेला ..
अहाँ की देखलौं !!

 

नीक या बेजाय जेहेन लागल  … जरुर कहब !


माँ

माँ 

सर्दी का वह मौसम

 

और सुबह कि पहली धूप

 

पीले आँचल में लिपटा

 

माँ का वो दूधिया रूप।

 

लेकर पूजा कि थाली

 

तुलसी चौड़े तक जाना

 

मुँडेर पर कौए का इतराना



 टन टन .. टन टन ...

 

आठ आने का खोमचा

 

मेरे जिद के आगे

 

हर बार विफल होती थी

 

आँचल के

 

खूंट में बंधा दो रूपया

 

माँ मुझको दे देती थी ..

 

क्रमश ...







अच्छी या बुरी जैसी भी ,अपना विचार अवश्य दें 

खुजली न होता तो

खुजली न होता तो इतना हँसाता कौन

जान चुके जिस शिकारी को

फिर से उसके जाल में फँसाता कौन

कश्मीर अपने बाप को लौटाता कौन

मुद्दे दिल्ली में आरक्षण का उठाता कौन

ये तो बुद्धु थी जनता,

वर्ना वंदे मातरम गाता ही कौन !

मोहब्बत भाईचारे फैलाता कौन

बकरे और कसाई को

एक घाट पर पानी कहो फिर पिलाता कौन


लेकर झारु इतराता कौन

भैंस के आगे बीन बजता कौन

पर एक बात बतादे भैय्या

जिस कॉंग्रेस को तू देता गाली

उसके बिना तू है कौन ???

                                     अच्छी या बुरी जैसी भी ,अपना विचार अवश्य दें  

सम्पूर्ण महाभारत बाँकी है


कमर कस ले ऐ 

 

भगवा फहराने वाले

 

अभी लाख लांक्षणा बाँकी है

 

दुश्मन होशियार बहुत है

 

ये तो बस एक झांकी है

 

तू अभिमन्यु सा चक्रव्यूह भेद रहा

 

अट्ठहास कौरवों का झेल रहा

 

घेरे में भगवान भी होंगे

 

सम्पूर्ण महाभारत बाँकी है





अच्छी या बुरी जैसी भी ,अपना विचार अवश्य दें 

हममें भी आपको कोई अपना ही मिलेगा


दुख को बाँट दे हममे ...

 

हँसा छुपकर भी कीजिये तो चलेगा !

 

हमें आवाज लगाइये न लगाइये ....

 

भरोसा मेरे साथ होने का न किया तो खलेगा 

 

खालीपन तो मन के गलियारों में है ...

 

ज़रा नज़र तो उठाइये ...

 

हममें भी आपको कोई अपना ही मिलेगा :)

 




अच्छी या बुरी जैसी भी ,अपना विचार अवश्य दें 

----हार पर विजय---


                                                                                      ----हार पर विजय---


हार गिरे तब धार करे 

जब धार करे तब वार करे 

जब वार करे संहार करे 

हुंकार भरे हुँकार भरे 

ग्लानी कुंठा को जगह नहीं अब 

तज स्वाभिमान और आडम्बर को 

कृतग्य भाव से अमूल्य समय का सत्कार करे 

विविधा नहीं दुविधा नहीं 

बाधाओं को आने दो 

बन अंधकार के बादल मंडराने दो 

प्रतिकार करे प्रतिकार करे 

जो घात करे प्रतिघात करे 

सहश्त्र भानु पर विजय करे 

क्यों चंद्रकला को भ्रमित हो 

श्रम हमारा रथ होगा धैर्य हमारी ढाल 

द्रिढता को तलवार करे 

अटल युद्ध पर अडिग हों 

हर मुश्किल को हम पार करे 

हार गिरे तब धार करे 

जब धार करे तब वार करे 

जब वार करे संहार करे



अच्छी या बुरी जैसी भी ,अपनी विचार अवश्य दें