माँ जब मैं घर आऊँगा
माँ
जब मैं घर आऊँगा :
वहाँ
निरीह
पर निरर्थक
निर्भीक,
निर्बद्ध
पर निमग्न
प्रात
का उमंग
मध्य
का आलस
सांझ
कि शिथिलता
निशा
चकोरी सा
यूँही
दिवस गुजरते थे
होती
उमंग तो
पर
लग जाते समय के पाँवो में
दुख
में दिन यूँही ठहरा रहता था
यहाँ
सूने
राहों में धूल के गुब्बार नहीं
उठते
न
हवायें शोर करती है
न
ही जलते रहने कि विवशता
पर
सूरज दक्षिण में उगता है
तुम्हे
सब सुनना होगा
पर
मैं न बताऊंगा
गेंहूँ
कि रोटी,
मूँग
कि दाल
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भोग
न सही
पर
भर पेट खाना खाऊँगा
माँ
जब मैं घर आऊँगा
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