Sunday, February 9, 2014

लघु पंक्तियाँ


लेकर कीमत साँसों कि

फूलों का तौफा देते हैं


कैसे गैरों से मोहब्बत होती है

यहाँ तो अपने धोखा देते हैं !

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माना जो गुज़र गया सो गुज़र गया
 

पर ज़ख्म वो इतना गहरा छोड़ गया
 

की जब भी उसे भुलाने की सोची
 

कमबख्त ये भरने से मुकर गया

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सोचती होगी छोड़ उसे चैन से सो रहा होऊंगा

 


और ये भी जानती है की उसके बिना जी नहीं सकता

 

बैठ कोने में कहीं रात भर रो रहा होऊंगा ...

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बहुत रात हो गयी है

अब तुम भी सो जाओ


क्यों जगाते हो और ...


जागते हो मेरे ख्यालों में



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कब से इस उलझन में हूँ 

 

गोरी गेंदा गमके या तू 

 

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अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें

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