Sunday, February 9, 2014

कीमती है ठहराव।

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निशां छोड़ दे तू इस कदर यादों के फलक पे

 

के जब भी तेरा जिक्र आये

 

होंठ मुस्कुराये और अश्रु बाँधे न बंधे पलक पे

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महज

 

साँसों का उतार-चढ़ाव

 

नहीं है जिंदगी

 

वक़्त ढलान है

 

जीवन यात्रा

 

प्रेम पड़ाव।

 

इस आपाधापी में

 

कुछ

 

कीमती है

 

तो है

 

ठहराव। 

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भावनाएँ प्रबल है

 

हम साथ सबल

 

समय निष्ठुर

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जानता हूँ

 

तुमने अंतरमन में

 

अथाह प्रेम सिमेट रक्खा है

 

पर ...

 

इस प्यार को पाने में

 

उसी तरह घायल हो जाता हूँ

 

जैसे नारियल फोड़ के खाने में !

 

तुम …

 

आम सा क्यूँ नहीं होती …

 

जरा सी छुअन से मधुर रसधार से भीगा देती !


 अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें 

शत्रु पराये हैं नहीं, आसतीन में छुपे साँप है

कॉंग्रेस के हाथ में जिसका भी हाथ है 

 

देश के दुर्भाग्य में उस का भी साथ है 

 

 

लानत उसपर जो हिंदुओं के खिलाफ है
 

गुनहगार सब यहाँ चाहे हम हैं या आप हैं 



जम रहा लहू यहाँ बस्ती में क्यूँ आग है
 

आसाम में चुप, तो गोधरा पर क्यूँ अलाप है



किसकी है ये जमीं किसकी ये जागीर है


क्यूँ तलवे तले रौंद रहा क्यूँ हो रहा प्रलाप है


 

अडिग था जोकभी, सत्य वो रहा क्यूँ काँप है
 

शत्रु पराये हैं नहीं, आसतीन में छुपे साँप है


 

क्या हार कि है ये धुन या प्रलय कि कोई थाप है
 

रक्तधार सा होरहा प्रवाह रहा गंगा कि ये विलाप है

 

क्यों कौटिल्य सो रहा किसका ये शाप है 
 

मनु नहीं मिल रही गुम कहाँ प्रताप है !


अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें

उस दो आने कि इमरती पर ..

उस दो आने कि

इमरती पर मेरा जी अटका रहा

किस्मत और हैशियत ने

मुझे चॉकलेट वाले केक पड़ोस दिए

मदमाती माधुर्य मथित मधुसरिस

उस चाशनी में

मेरा जी अटका रहा


कीमत तो थी दो आना ही

पर रस का मोल लगाना नामुमकिन


कोई नयन से तार रहा

कागा ले उड़ने को ताक रहा

घात लगाये श्रृगाल खड़े

बस तब तक

जब तक

जड़ जड़ रक्षक जाग रहा !

मेरा जी अटका रहा


किसी कुसुम कि पंखुड़ियों से

थे कोमल उसके अंग बड़े

स्पर्श अलौकिक, मौन रहा

पलक पाँवड़े पंकज में ही

मैंने कितने अंक भरे


सीढ़ी चढ़ता देवालय का

पर मंद मंद मुस्काती मेवा

मेरा मन भटका रहा

उस दो आने कि

इमरती पर मेरा जी अटका रहा

मेरा जी अटका रहा 

 

 

अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें  

लौटकर आऊँगा

तुम्हे छोड़

 

बहुत दूर चला जाऊँगा।

 

वर्षों बाद फिर

 

लौटकर आऊँगा।

 

यदि राह तके तुम मेरे

 

तो जन्मों का फिर बंधन।

 

वर्ना

 

मैं तो जोगी था ही

 

फिर से जोगी बन जाऊँगा।

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 तेरा मुझसे प्रेम करना … एहसान है मुझपर

भला भस्म रमाता जोगी से भी क्या कोई मोहब्बत करता है।



अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें

क्यों पूछते हो कि प्रेम क्या है

क्यों पूछते हो कि प्रेम क्या है


क्यों पूछते हो कि प्रेम क्या है

 

उतर के देखो आंधियाँ है

 

जर्रे में शंभु लीन बैठे

 

महमहे में है तल्ख कितनी

 

क्या तखलीक कि कोई खामियाँ है


महमहे -- सुगंध
तल्ख -- तीक्ष्ण
तखलीक --रचना creation

अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें



शुभ प्रभात का शुभ वंदन

शुभ प्रभात का शुभ वंदन  

चल उठ कर शुभ वंदन
ये जीवन-मरण का व्यर्थ क्रंदन
तज परमारथ को स्वार्थ सकल
तू बह कल कल
मातृभूमि को आह्लादित करने वाली
गंगा निर्मल

उ रह जे हिंदी छांटी रहल रह

करेजा फैट गेल...


हम हुनका सs मैथिलि बsजलौं


उ रहs जे हिंदी छांटी रहल रहs

 घंटा भरक बात मs कान तरैस गेल 


मुदा एक शबद नै मैथिलि बाजलक


पुछ्लौं झाजी घर कतs भेल?


कहलक दरभंगा "I m outside from a long " 


आखिर हमर मsन हरखित भेल


जब सुनलौं मैथिलि हुनकर मुख स


पुछला पर की अप्पन भाषा किया नs बजै छि


बच्चा सsब कs किया नs गाम भेजै छि 


कहलक --यौ की कही लाज लगे य


फाटs धरती जे हम समाबौं, हमर मू मs धान दियौ तs लावा 


कहलों हुनका जे यौ अहाँ कोन नौकरी करै छि 


जे अप्पन भाषा कs एना तजै छि 


"
मैथिलि" s सम्मान भेटल य


ओही सs पहचान भेटल य 


क्रमश: ...

 

नीक या बेजाय जेहेन लागल  … जरुर कहब !