Friday, February 14, 2014

प्रेम : है किसमे इतनी हिम्मत ?


छीन ले मुझसे तुझको
है किसमे इतनी हिम्मत
तू जहाँ तलक ले जा उसको
मैं वहाँ वहाँ तक आऊँगा
मैं तेरी परछाई हूँ
फिर साथ भला क्या छोड़ूँगा
सब मरने कि बातें करते हैं
तू इक अवाज बस देदेना
मैं फिर से जिंदा होकर आऊँगा

मैं गगन-धरा कर दूँगा एक
सुन पलकों पर न आँसू लाना
मेरी खुद्दारी ललकारी जाती है
बरबस खून उबलते हैं
हया धरी रह जाती है
छीन ले मुझसे तुझको
है किसमे इतनी हिम्मत !

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आकांक्षायें और अपेक्षा अवसाद का कारण है।

Expectation and desire are the cause of grief . 

LoVe like a भारतीय !
LiVe like a भारतीय  !

Thursday, February 13, 2014

माँ जब मैं घर आऊँगा

माँ जब मैं घर आऊँगा :

वहाँ

निरीह पर निरर्थक 

 

निर्भीक, निर्बद्ध पर निमग्न 

 

प्रात का उमंग 

 

मध्य का आलस 

 

सांझ कि शिथिलता 

 

निशा चकोरी सा 

 

यूँही दिवस गुजरते थे 

 

होती उमंग तो 

 

पर लग जाते समय के पाँवो में 

 

दुख में दिन यूँही ठहरा रहता था 

 

यहाँ  

 

सूने राहों में धूल के गुब्बार नहीं उठते 

 

न हवायें शोर करती है 

 

न ही जलते रहने कि विवशता 

 

पर सूरज दक्षिण में उगता है 

 

तुम्हे सब सुनना होगा 

 

पर मैं न बताऊंगा 

 

गेंहूँ कि रोटी,

 

मूँग कि दाल 

 

56 भोग न सही 

 

पर भर पेट खाना खाऊँगा 

 

माँ जब मैं घर आऊँगा 

 

 

Monday, February 10, 2014

कम दहेज लेना भी सितम है


आजकल मार्केट इतना गरम है 

 

कि कम दहेज लेना भी सितम है

 

15 से 20 लाख तक कि बोली लगाते हैं

 

जो इससे कम में आते हैं

 

वो आदर्श-आदर्श चिल्लाते हैं

 

7 लाख कोई रकम है,

 

लेकर भी, मैंने नहीं लिया

 

बतलाते हैं

 

आजकल एक नया चलन है

 

विवाह में उसी को बुलाते हैं

 

जो पार्टी कि शान बढ़ाते हैं ..

 

वर्ना सुदामा तो पैदल

 

हसतिनापुर तक आते हैं।

 

कम दहेजो लेनाय सितम य (Maithili)



आय-कैल मार्केट एतबा गरम य

 

कि कही कम दहेजो लेनाय सितम य

 

15 20 लाख तक के बोली लगै य

 

जे एकरा स नीचा आबै य

 

से अपना का आदर्श बतबै य

 

7 लाख कुनु रकम छि, लाइयो क,

 

हम नै लेलौं कहै छि

 

आय-कैल एक नया चलन य

 

लोक ब्याह म ओकरे बजबैत अछि

 

जे पार्टी के शान बढ़बै य

 

नै त सुदामा त ..

 

पैदल हस्तिनापुर तक आबै य।

 

मैं इंडिया गेट हूँ ...


मैं इंडिया गेट …


भारतीय सेना ही नहीं

भारतीय सीना कि पहचान

मर मिटनेवालों ने कौम नहीं देखा

बस वफादारी देखी    …

हजारो शहीदों के नाम का तख्त

जिन्होंने कर्त्तव्य से बढ़ कुछ नहीं देखा

आज भी हमारे जवान

मोर्चा सम्भाले हुए हैं देश से बाहर

कभी उनके कंधे सहारा बनते

साऊथ अफ्रीका के भूकम्पों में

कभी UNO में सेवा देते

या लड़ रहे हैं  … कर रहे हैं

आतंकियों को नेस्तनाबूत

70,000 सेना

माना जिसके लिए लड़े

वो अंग्रेज थे  ..

पर

छलनी होने वाला सीना

हिंदुस्तानी था।

माना इमारत गैरों ने गढ़ दी

पर इसकी हर ईंटे . .

वीरता कि कहानी

माओं ने जो बेटे  

प्रथम विश्वयुद्ध में खोये

क्या वो नहीं थे

भारतीय  … ?  

उकेरे गए जो नाम

वो कोई और नहीं  …

हमारे ही अपने थे

मैं इंडिया गेट हूँ  …

मेरे वक्ष पर प्रज्वलित

जो अंगारे हैं

यह उन अमर शहीदों के

यादों के शीतल फव्वारे हैं 


 

Sunday, February 9, 2014

कहमुकरी : प्रेम

कहमुकरी : प्रेम 

न कछु रासै न केहु भावै 

 

 कर्ण बजै मधुर संगीत

 

के सखी उलझन , न सखी प्रीत


रूठता तो माँ से था




मैं कभी नहीं रूठूँगा  …
कभी नहीं
कभी नहीं रूठूँगा !
कभी नहीं रूठूँगा तुमसे !!
क्यूँकि रूठता तो माँ से था  …
वो मनाये बिना न सोती थी।


तुम्हे जीत तो मैं लूँगा ही  … अफसोस प्रेम भी जीता जा सकता !

 

अच्छा या बुरा जैसाभी, अपना विचार अवश्य दें

अब जो फिर कोई 'दामिनी' बनी


॥राजस्थान मेँ पल-पल मौत जूझती गैंगरेप की शिकार मिथिला की एक बेटी॥

बाबूजी आज तू नहीं

 

तो तेरी बेटी अकेली है

 

मेरी आवाज़ गलियों तक भी न पहुँचती,

 

आँगन में ही सिमट जाती है।


 

मैंने क्या बिगारा था ?

 

मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया ?

 

लोग कहते हैं मेरा बलात्कार हुआ

 

अब तुम्हारी मैना नहीं चहचहाती है।



 

याद है मुझे तुम्हारे काँधे पर मेले में घूमना

 

मिटटी के खिलौने या चीनी का मुरब्बा माँगना,

 

इससे जादा क्या माँगा था जो रूठ गए ...

 

अब तुम्हारी बेटी बहादुर है, उसे कुत्ते के भौंकने से डर नहीं लगता

 

पर इंसानी चेहरे डराती है।

 

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अब न पड़ने दो किचड़ मानवता के शाख पर

क्यूंकि अब जो फिर कोई 'दामिनी' बनी

संविधान होगा ताक पर ...

आसान नहीं राधा सा प्रेम करना

क्या रिश्ता है तेरा मुझसे ??? …………

 

दबे पाँव कमरे में आती हो और मुझे चैन से सोया देख फिर कहीं … गुम हो जाती हो !

 

 .... तुम क्यूँ याद आती हो। … तुम क्यूँ याद आती हो।

 

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रुक्मिणी बन आसान है प्रेम करना … आसान नहीं राधा सा प्रेम करना।

  

तुमने अपनी एक गलती दबाने को वो सब पन्ने पलट डाले जिनमे मेरा दर्द उकेरा था


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चल भगवा लहरा ले

चल भगवा लहरा ले

खो चुके जो मान धरा पर

फिर से उसको पा लें

चल बढ़ा कदम ओ साथी

मिलकर भारत बचा लें !

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लघु पंक्तियाँ


लेकर कीमत साँसों कि

फूलों का तौफा देते हैं


कैसे गैरों से मोहब्बत होती है

यहाँ तो अपने धोखा देते हैं !

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माना जो गुज़र गया सो गुज़र गया
 

पर ज़ख्म वो इतना गहरा छोड़ गया
 

की जब भी उसे भुलाने की सोची
 

कमबख्त ये भरने से मुकर गया

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सोचती होगी छोड़ उसे चैन से सो रहा होऊंगा

 


और ये भी जानती है की उसके बिना जी नहीं सकता

 

बैठ कोने में कहीं रात भर रो रहा होऊंगा ...

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बहुत रात हो गयी है

अब तुम भी सो जाओ


क्यों जगाते हो और ...


जागते हो मेरे ख्यालों में



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कब से इस उलझन में हूँ 

 

गोरी गेंदा गमके या तू 

 

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अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें

कीमती है ठहराव।

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निशां छोड़ दे तू इस कदर यादों के फलक पे

 

के जब भी तेरा जिक्र आये

 

होंठ मुस्कुराये और अश्रु बाँधे न बंधे पलक पे

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महज

 

साँसों का उतार-चढ़ाव

 

नहीं है जिंदगी

 

वक़्त ढलान है

 

जीवन यात्रा

 

प्रेम पड़ाव।

 

इस आपाधापी में

 

कुछ

 

कीमती है

 

तो है

 

ठहराव। 

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भावनाएँ प्रबल है

 

हम साथ सबल

 

समय निष्ठुर

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जानता हूँ

 

तुमने अंतरमन में

 

अथाह प्रेम सिमेट रक्खा है

 

पर ...

 

इस प्यार को पाने में

 

उसी तरह घायल हो जाता हूँ

 

जैसे नारियल फोड़ के खाने में !

 

तुम …

 

आम सा क्यूँ नहीं होती …

 

जरा सी छुअन से मधुर रसधार से भीगा देती !


 अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें 

शत्रु पराये हैं नहीं, आसतीन में छुपे साँप है

कॉंग्रेस के हाथ में जिसका भी हाथ है 

 

देश के दुर्भाग्य में उस का भी साथ है 

 

 

लानत उसपर जो हिंदुओं के खिलाफ है
 

गुनहगार सब यहाँ चाहे हम हैं या आप हैं 



जम रहा लहू यहाँ बस्ती में क्यूँ आग है
 

आसाम में चुप, तो गोधरा पर क्यूँ अलाप है



किसकी है ये जमीं किसकी ये जागीर है


क्यूँ तलवे तले रौंद रहा क्यूँ हो रहा प्रलाप है


 

अडिग था जोकभी, सत्य वो रहा क्यूँ काँप है
 

शत्रु पराये हैं नहीं, आसतीन में छुपे साँप है


 

क्या हार कि है ये धुन या प्रलय कि कोई थाप है
 

रक्तधार सा होरहा प्रवाह रहा गंगा कि ये विलाप है

 

क्यों कौटिल्य सो रहा किसका ये शाप है 
 

मनु नहीं मिल रही गुम कहाँ प्रताप है !


अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें

उस दो आने कि इमरती पर ..

उस दो आने कि

इमरती पर मेरा जी अटका रहा

किस्मत और हैशियत ने

मुझे चॉकलेट वाले केक पड़ोस दिए

मदमाती माधुर्य मथित मधुसरिस

उस चाशनी में

मेरा जी अटका रहा


कीमत तो थी दो आना ही

पर रस का मोल लगाना नामुमकिन


कोई नयन से तार रहा

कागा ले उड़ने को ताक रहा

घात लगाये श्रृगाल खड़े

बस तब तक

जब तक

जड़ जड़ रक्षक जाग रहा !

मेरा जी अटका रहा


किसी कुसुम कि पंखुड़ियों से

थे कोमल उसके अंग बड़े

स्पर्श अलौकिक, मौन रहा

पलक पाँवड़े पंकज में ही

मैंने कितने अंक भरे


सीढ़ी चढ़ता देवालय का

पर मंद मंद मुस्काती मेवा

मेरा मन भटका रहा

उस दो आने कि

इमरती पर मेरा जी अटका रहा

मेरा जी अटका रहा 

 

 

अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें  

लौटकर आऊँगा

तुम्हे छोड़

 

बहुत दूर चला जाऊँगा।

 

वर्षों बाद फिर

 

लौटकर आऊँगा।

 

यदि राह तके तुम मेरे

 

तो जन्मों का फिर बंधन।

 

वर्ना

 

मैं तो जोगी था ही

 

फिर से जोगी बन जाऊँगा।

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 तेरा मुझसे प्रेम करना … एहसान है मुझपर

भला भस्म रमाता जोगी से भी क्या कोई मोहब्बत करता है।



अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें

क्यों पूछते हो कि प्रेम क्या है

क्यों पूछते हो कि प्रेम क्या है


क्यों पूछते हो कि प्रेम क्या है

 

उतर के देखो आंधियाँ है

 

जर्रे में शंभु लीन बैठे

 

महमहे में है तल्ख कितनी

 

क्या तखलीक कि कोई खामियाँ है


महमहे -- सुगंध
तल्ख -- तीक्ष्ण
तखलीक --रचना creation

अच्छा या बुरा जैसा भी, अपना विचार अवश्य दें



शुभ प्रभात का शुभ वंदन

शुभ प्रभात का शुभ वंदन  

चल उठ कर शुभ वंदन
ये जीवन-मरण का व्यर्थ क्रंदन
तज परमारथ को स्वार्थ सकल
तू बह कल कल
मातृभूमि को आह्लादित करने वाली
गंगा निर्मल

उ रह जे हिंदी छांटी रहल रह

करेजा फैट गेल...


हम हुनका सs मैथिलि बsजलौं


उ रहs जे हिंदी छांटी रहल रहs

 घंटा भरक बात मs कान तरैस गेल 


मुदा एक शबद नै मैथिलि बाजलक


पुछ्लौं झाजी घर कतs भेल?


कहलक दरभंगा "I m outside from a long " 


आखिर हमर मsन हरखित भेल


जब सुनलौं मैथिलि हुनकर मुख स


पुछला पर की अप्पन भाषा किया नs बजै छि


बच्चा सsब कs किया नs गाम भेजै छि 


कहलक --यौ की कही लाज लगे य


फाटs धरती जे हम समाबौं, हमर मू मs धान दियौ तs लावा 


कहलों हुनका जे यौ अहाँ कोन नौकरी करै छि 


जे अप्पन भाषा कs एना तजै छि 


"
मैथिलि" s सम्मान भेटल य


ओही सs पहचान भेटल य 


क्रमश: ...

 

नीक या बेजाय जेहेन लागल  … जरुर कहब !